अबोध बच्ची को लेकर शुरू हुआ पत्रकारों के बीच वैचारिक द्वंद



एक ओर जहां देश-भर में महिला आरक्षण को लेकर चर्चाएँ जोर-शोर से की जा रही हैं, वहीं दूसरी ओर छत्तीसगढ़ की राजधानी में 20 दिनी बच्ची को बेचे जाने का मामला गर्म है। इस मुद्दे ने प्रदेश के पत्रकार या बुद्धिजीवी वर्ग को दो भागों में बांट दिया है। इनमें से एक वर्ग वह है, जो गुरुकुल आश्रम में अनाथ बच्ची को कथित रूप से बेचे जाने की घटना को मानवता और इनसानियत का अमलीजामा पहनाने पर तुला है, तो दूसरा वर्ग बच्ची बेचने में कथिर आरोपी नारायण राव एवं पूरे आश्रम को संदेह के दायरे में लाने पर तुला हुआ है।

मामला इतना गर्म हो चुका है कि अब इस लड़ाई को ब्लाग के माध्यम से इंटरनेट में भी शुरू कर दी गई है। आश्रम, बच्ची और नारायण राव को लेकर पत्रकार जगत के राजकुमार सोनी, ब्रम्हवीर सिंह, रुचीर गर्ग, अनिल पुसदकर, रवि नामदेव जैसे कई दिग्गज एक दूसरे के मतों के खिलाफ खड़े हो गए हैं। प्रकरम में जहां अनिल पुसदकर का मानना है कि आश्रम की पूरी गतिविधियों को पारदर्शी बनाना चाहिए। आश्रम में दान देने वालों को यह जानना जरूरी है कि उनके द्वारा दिया गया दान किस मद में और किसके लिए खर्च किया जा रहा है। वहीं दूसरी ओर राजकुमार सोनी ने एक ओर से यह स्पष्ट करने का मन बना लिया है कि गुरुकुल आश्रम में जो घटनाएं घटी हैं, या नारायण राव के द्वारा दान की मांग गलत नहीं है। इस बीच ब्रम्हवीर सिंह का मानना है कि नारायण राव अनाथ बच्चों का पालन पोषण कर रहा है, वह ठीक है, लेकिन इसके एवज में दान की मोटी रकम की मांग किसी भी सूरत में उचित नहीं है। अमुमन यही सोच रुचीर गर्ग, रविनामदेव एवं अन्य पत्रकारों व समाज सेवियों की भी है।
इस प्रकरण में दोनों पक्ष एक दूसरे को गलत साबित करने के चक्कर में संभवत: एक दूसरे के व्यक्तिगत रूप से दुश्मन बनते जा रहे हैं। जहां आश्रम में हुई बच्चे बेचने की घटना में एक पक्ष दोषियों के खिलाफ कार्रवाई व बच्चों को अन्यत्र स्थानांतरित करने के लिए मंत्री से मिलता है, तो दूसरा पक्ष नहले पर दहला मारते हुए समूह लेकर सीधे मुख्यमंत्री से मिलकर बच्चों के लिए गुहार लगाता है। गलियारों में सुनने में तो यह भी आ रहा है कि आश्रम में हुए स्टिंग आॅपरेशन में शामिल और नारायण राव के खिलाफ खड़े हुए लोगों के खिलाफ कुछ ने सबक सिखाने तक का निर्णय ले लिया है। मामले को लेकर तार नर्मदा बचाओ आंदोलन की मेधा पाटकर के साथ हुए वाकिए को भी जोड़ दिया गया है।
बहरहाल इस पूरे मुद्दे में ऐसे बहुत से लोग हैं, जिन्होंने इससे अपने आप को पूरी तरह से अलग कर लिया है, लेकिन वे दबे जुबान से ही सहीं लेकिन आश्रम के बच्चों को लेकर चिंतित है। उनका मानना है कि अपराध के बाद कई मामलों में आरोपी के साथी उसे दोष मुक्त करा लेते हैं, और जब वह इसमें विजयी हो जाते हैं, तब वह उनके खिलाफ बगावत करने वालों के लिए कुचक्र रचकर उन्हें अक्सर नुकसान पहुचाते हैं।

  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • RSS

5 टिप्पणियाँ:

Anil Pusadkar ने कहा…

वरूण जी एक बात मेरी समझ मे नही आ रही है कि एक बच्ची को बेचने के मामले को आश्रम और दूसरे बच्चों से क्यों जोड़ा जा रहा है।ऐसा लग रहा है कि दोनो मामले का घालमेल करके आरोपी नारायण राव को बचाने की मुहीम चल रही हो।मेरा एक छोटा सा सवाल है जो उस आश्रम को चालू रखने के लिये हाथ पैर मार रहे समाज सेवियों से भी था,क्या एक बच्ची को ढाई लाख रूपये देकर किसी को भी सौंपा जा सकता है?क्या इस बात को आश्रम के संचालक मंडल के सामने रखा गया?क्या संचालक मण्डल की इस मामले मे सहमति थी?और अगर सब कुछ नियमानुसार किया जा रहा था तो ढाई लाख रूपये का चेक आश्रम के नाम पर न लेकर सेल्फ़ क्यों लिया गया?सवाल तो और भी बहुत से हैं वरूण जी लेकिन क्या एक अबोध बच्ची को बेचने का घोर पाप करने वाले को सिर्फ़ इसलिये बख्श दिया जाना चाहिये कि वो एक आश्र्म चलाता है?नारायण राव के बारे मे आपको शायद ज्यादा पता न हो?अगर आप जानना चाहेंगे तो आप कभी-भी मुझे फ़ोन करके मिल सकते हैं,मैं आपको और भी बहुत कुछ बता दूंगा जो इस माम्ले मे मेरी राय को सही साबित कर देगा।मेरे नं है 9827138888,9425203182। मुझे आपका इंतज़ार रहेगा।

bhart yogi ने कहा…

वरुण झा भी अब खतरनाक होता जा रहा है। समझ में नहीं आ रहा है हंसू की न हंसू एक जूनियर पत्रकार ने राजधानी के उन तमाम सीनियर पत्रकारो को आईना दिखा दिया है। जिन्होंने यतीम बच्चो की आड़ में अपनी लड़ाई शुरु कर दी है। इस पूरे मामले में किसी भी अखबार की खबर हकीकत से कोसो दूर है। मेैं इस घटनाक्रम से जुड़े सभी पत्रकारो का जूनियर हुं। सब की हकीकत जनता हूं। कौैन क्यो लिख रखा रहा है, और कौन किसको बचा रहा है ,कौन किसके कहने पर लिख (दिखा)रहा है , मेरा उनसे गुजरिश है कि यतीम बच्चो पर रहम खाओ, नौकरी करने के लिए बहुत से खबर हैं। बचपन में राजेश खन्ना की रोटी फिल्म देखी थी। जिसका एक गीत दिल को छू गया था। जब भी अपने आप को बहुत अच्छा इंसान समझ कर किसी की बुराई करने की सोचता हूं तो याद आ जाता है,
यार हमारी बात सुनो ...ऐसा एक इंसान चुनो... जिसने पाप न किया हो.... जो न पापी हो....कोई है चालक आदमी ...कोई सीधा साधा ...हममें से हर एक है पापी ...थोड़ा कोई ज्यादा ...

varun jha ने कहा…

अनिल जी आप मेरे ब्लाग पर आए यह मेरी खुशकिस्मति है, आपके विचारों से एक बात तो स्पष्ट होती ही है कि प्रकरण में गुनाहगार व्यक्तिं के खिलाफ कठोर कार्रवाई होनी चाहिए. न्याय करते वक्त भावनाएं अलग कर दी जाती हैं

राजकुमार सोनी ने कहा…

वरूण,
जो कुछ हो रहा है वह निशिचत तौर पर ठीक तो नहीं है,लेकिन तुम इस बात को अच्छी तरह से शायद तब समझ पाओ जब तुम इसके पीछे के पूरे गुणा-भाग को समझो। क्या तुम यह बता सकते हो कि बिग्रेड वाले ही आपरेशन क्यों करते हैं। खोवा कांड उजागर होगा तो बिग्रेड, ताकत की दवा बनाने वालों का भंडाफोड़ होगा तो वही लोग। क्या किसी भी काम को करने के पहले कानून का सहारा नहीं लिया जा सकता। हो सकता है कि लोग कहे कानून के पास इतनी फुरसत कहां है कि वह हर जगह हाथ-पांव मारे, लेकिन फिर भी मुझे लगता है कि जरूर कोई बड़ा रैकेट है जो इस तरह के कामों में लगा हुआ है। यह रैकेट सूचना के अधिकारों का उपयोग करता है। दबाब बनाता है। जिनसे मामला जम जाता है उसे छोड़ दिया जाता है और जिससे बात नहीं बनती है उसे एक्सपोज कर दिया जाता है। मेरे प्रशासनिक सूत्र भी यही कहते हैं कि मामला कुछ ऐसा ही है। अभी इस मामले में पूरी सच्चाई तो आनी बाकी है। बाकी तुमने जो लिखा कि शायद हम पत्रकार लोग आपस में लड़ रहे है। तुम शायद इसे लड़ाई समझ रहे हो। मैं मानता हूं कि वैचारिक सहमति- असहमति हर पेशे में मौजूद रहती है। दिल्ली-भोपाल के पत्रकारों की लड़ाई देखोंगे तो दहल जाओंगे। पुसदकर जी ने जो कुछ लिखा है उसका जवाब मैं अपनी पोस्ट व उनकी टिप्पणी के नीचे की गई टिप्पणी के साथ दे चुका हूं। मेरा मानना है कि यहां तो लोग अपने दो बच्चों को ढंग से नहीं पाल पा रहे हैं ऐसे में एक आदमी दूसरों बच्चों को पालने की कोशिश कर रहा था। क्या ऐसे प्रयासों का कोई मूल्यांकन नहीं होगा। पुसदकरजी कभी नारायण राव के साथ जुड़े थे। पुसदकरजी का कहना है कि वह उनके साथ धोखा कर चुका है। पुसदकर जी की बात शायद सही हो,लेकिन मेरा मानना है कि वालमिकी भी पहले डकैत ही थे। हम उनकी रामायण क्यों पढ़ते हैं। गांधी को पूरी दुनिया मानती है। वे यह कहकर इस दुनिया से कूच कर गए हैं कि- घृणा अपराध से करो अपराधी से नहीं। हर अपराध के पीछे कोई न कोई मजबूरी जरूर होती है। चोट प्रवृतियों पर होनी चाहिए आदमी पर नहीं। जब तक प्रवृति नहीं बदली जाएंगी तब तक कुछ भी बदलने से रहा। अभी दो रोज पहले ही कोई मुझसे कह रहा था कि नारायण राव सरकारी सेवा में था और नौकरी करने नहीं जाता था। यदि कोई बच्चों के काम के लिए नौकरी नहीं करता था तो क्या यह अपराध हो गया। तनख्वाह नहीं लेता था तो क्या अपराध हो गया। मेरा मानना है कि आदमी को वही काम करना चाहिए जिससे उसको खुशी मिले। मुझे बच्चों के लिए काम करते हुए खुशी हो रही है। मैं पत्रकारिता में कमसे कम बाबू बनकर काम करने के लिए तो नहीं आया हूं और न ही किसी से लड़ने का मेरा इरादा है। मैं जो कुछ कर रहा हूं वह मेरा निजी फैसला है। मैं हमेशा गरीब-पीडित-शोषित के पक्ष में खड़ा रहता आया हूं। आगे भी खड़ा रहूंगा। मैं तुमसे हमेशा यही कहता आया हूं कि अपनी कलम से कभी किसी ऐसे आदमी का नुकसान मत करो जो निरीह हो। मैं दो रुपए ज्यादा में समोसा-बड़ा भजिया बेचने वालों का ठेला उजाड़ने वाले लोगों में से नहीं हूं और न ही कभी यह लिखना पंसद करूंगा कि पांच-पांच रुपए में थ्री इडियट्स की सीडी सड़क पर बिक रही है। ऐसा मैं इसलिए नहीं करूंगा क्योंकि सीडी बेचने वाले किसी विकलांग को जब पुलिस दौड़ाएंगी तो वह दौड़ भी नहीं पाएंगे। तुम जानते हो पत्रकारिता में इस तरह की गलती करने वाले लोग मौजूद है। मैं तुमसे पहले भी इस बारे में चर्चा कर चुका हूं।

varun jha ने कहा…

सोनी जी आप मेरे ब्लाग में आए, इसका में तहे दिल से स्वागत करता हूं। आप के विचारों का भी मैं सम्मान करता हूं। मैंने थोड़ी बहुत कानून की पढ़ाई की है। उसमें यह लिखा है कि यदि कोर्ई भूखा बच्चा अपनी पेट की भूख मिटाने के लिए किसी हलवाई या दुकान से कुछ खाने की वस्तु चुरा लेता है, तो उसे चोर नहीं माना जा सकता है, लेकिन गुरुकुल आश्रम के मामले में शायद यह बातें लागू न हों?? वैसे नारायण राव ने बच्चे को गोद देने के लिए जितने भी रुपए लिए हैं या मांगे हैं। इसके कारणों पर विचार करना और निर्णय लेना न्यायालय का काम है। मेरा यह मानना है कि हमें इस संवेदनशील घटना में स्थिति स्पष्ट होने तक का इंतेजार करना होगा। राजीव ब्रिगेड एवं उसके सदस्यों एवं पदाधिकारियों के संबंध में मैं थोड़ा बहुत जानता हूं. इस प्रकरण में राजीव ब्रिगेड की भूमिका महत्वपूर्ण है, क्योंकि कहीं न कहीं उन्होंने समाज के एक दूसरे पहलुओं के संबंध में सोचने पर जरूर मजबूर कर दिया है।

एक टिप्पणी भेजें